चक समाज का इतिहास

लगभग सभी जातियों के अंतर्गत स्थान भेद और व्यवसाय भेद के कारण उपजातियां होती हैं। खटिक जाति के अंतर्गत भी भारत के विभिन्न राज्यों में अनेक उपजातियां हैं

पुस्तैनी कार्य – चक का पुश्तैनी काम काटने के लिए बकरा पालना, बेचना, बकरा काट कर मांस, खाल, ऊन बेचना रहा है, अपवाद के रूप में सूप बनाना, छलनी बनाना, ढोलक मढ़ना भी रहा है। ये बुंदेलखंड में चिकबा और कानपुर, आगरा, बरेली मंडल में चिक पुकारे जाते थे।

1950 के आस पास इस समाज के तत्कालीन महान समाजसेवी स्वर्गीय भैरव प्रसाद उर्फ महाशय जी ने चिकबा, चिक के बजाय चक लिखने की शुरुआत की।

लंदन के गोलमेज सम्मेलन में बाबा साहेब के भाषण से प्रभावित हो कर ब्रिटिश शासन ने तब तक डिप्रेस्ड क्लासेज कही जाने वाली अछूत जातियों को इंडिया एक्ट 1935 में अनुसूचित जातियाँ पुकारी जाने का संवैधानिक दर्जा दिया और उनको प्रगति के विशेष अवसर देने के लिए जब 1अप्रैल 1936 को ब्रिटिश सरकार ने भारत की अनुसूचित जातियों की सूची पहली बार प्रकाशित की तो उसमें खटिक जाति भी यूनाइटेड प्रॉविंस यानी आज के यूपी के लिए अनुसूचित जाति घोषित हुई। तभी से चक समाज सोनकर, सूर्यवंशी की भांति खटिक जाति के सदस्य के रूप में अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र प्राप्त कर रहा था।

यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि अनुसूचित जातियों की सूची राज्यवार तो होती है परंतु किसी भी राज्य को अनुसूचित जातियों की सूची में किसी नई जाति को जोड़ने या सूची से निकालने का अधिकार संविधान ने नहीं दिया।यह भी उल्लेखनीय है कि यद्यपि हर जाति में उपजातियां होती हैं लेकिन ब्रिटिश सरकार या आज़ादी के बाद भारत सरकार ने कभी भी उपजातियों की सूची नही बनाई, सिर्फ जातियों की ही सूची बनाई। किस क्षेत्र में कौन सी जाति की कौन सी उपजाति रह रही है ये स्थानीय राजस्व कर्मचारी, अधिकारी आसपास के लोगों से मौखिक पूंछतांछ से ही तय करते हैं। यानी यूपी के जिन जिलों में चिक या चिकबा रहते चले आ रहे थे वहां उन्हें खटिक जाति का सर्टिफिकेट मिल जाता था।

पिछड़ी जातियों यानी गैर अछूत शूद्र जातियों को भी प्रगति के विशेष अवसर देने के लिए जब वी पी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं तो सभी राज्यों में पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किये गए ताकि वे अपने अपने राज्यों के लिए पिछड़ी जातियों की सूची में नई पिछड़ी जातियाँ शामिल करने या पिछली सूची में गलती से शामिल जाति को निकालने की शिफारिश अपने अपने राज्यों की सरकारों से कर सकें।




उल्लेखनीय है कि भारत मे पहली बार पिछड़ी जातियों के कल्याण के लिए काका कालेलकर आयोग को जवाहरलाल नेहरू ने महाराष्ट्र के कांग्रेसी सांसद काका कालेलकर की अध्यक्षता में गठित किया था। इसे पहला राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग कहा गया। इस आयोग ने पिछड़ों के उत्थान के लिए जबर्दस्त सिफारिशें की थीं लेकिन उन्हें ब्राह्मणवादी मानसिकता वाली कांग्रेस ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था। हां उस वक़्त देश मे पिछड़ी जातियों की हिन्दू, मुसलमानों, ईसाइयों की राज्यवार सूचियां जरूर बन गयी थीं हर राज्य में। उत्तर प्रदेश में भी पिछड़ी जाति के हिंदुओं और मुसलमानों की सूची बनी थी। मुसलमानों की सूची में क्रमांक 3 पर चिकबा (कस्साब) सम्मिलित किये गए थे जिनका खटिक जाति के अंतर्गत आने वाले चिकबा से कोई लेना देना नही था।

हिंदुओं की पिछड़ी जातियों की सूची में ना तो चिक थे, ना चिकबा और ना ही चक। मंडल आयोग की सिफारिशों के अंतर्गत यूपी की पिछड़ी जातियों की सूची पुनरीक्षित करने का काम जब शुरू हुआ तो तमाम जातियों के संगठनों की ओर से आवेदन पत्र उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग, इंदिरा भवन, लखनऊ में भेजे जाने लगे। कानपुर के झींझक कस्बे के निवासी और मैनपुरी में कचहरी में एक वकील के मुंशी श्री ओमप्रकाश, जो कि चक समाज के थे, ने 8 नवम्बर 1994 को अपनी ओर से व्यक्तिगत हैसियत में आयोग को एक पन्ने का प्रार्थनापत्र दे कर लिखा कि हम चिकबा, चिक, चक कहलाते हैं और बकरा काटने का काम करते हैं। हमारी तरह जो मुसलमान बकरे का काम करते हैं वे चिकबा, कस्साब हैं और पिछड़ी जातियों की सूची में हैं इसलिए उन्हें पिछड़ी जाति के लिए सब लाभ मिलते है लेकिन चूंकि हम पिछड़ी जातियों की सूची में नहीं हैं इसलिए हमें कोई लाभ नही मिल रहा। श्री ओमप्रकाश ने यह प्रार्थना की कि यूपी की पिछड़ी जातियों की सूची में चक को भी सम्मिलित कर लिया जाए। श्री ओमप्रकाश ने प्रार्थना पत्र में कहीं भी यह नही लिखा कि हम खटिक जाति के अंतर्गत अनुसूचित जाति का लाभ वर्षों से प्राप्त कर रहे हैं।




उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग ने फील्ड सर्वे कराया होता तो स्पष्ट हो जाता कि चक, चिक, चिकबा खटिक जाति के अंतर्गत हैं इसलिए इसे पिछड़ी जातियों की सूची में सम्मिलित करना असंवैधानिक होगा। श्री ओमप्रकाश की प्रार्थना के आधार पर ही पिछड़ा वर्ग आयोग ने उत्तर प्रदेश सरकार को सिफारिश भेज दी कि चक को प्रदेश की पिछड़ी जातियों की सूची में सम्मिलित कर लिया जाए।यूपी की तत्कालीन मायावती सरकार ने 1995 में शासनादेश जारी कर चक को प्रदेश की पिछड़ी जातियों की सूची में सम्मिलित कर दिया। प्रदेश शासन के इस निर्णय के विरुद्ध संघर्ष हेतु मार्च 1998 में राष्ट्रवादी चक समाज सर्वागीण विकास परिषद का गठन किया गया और विधिवत पंजीकरण भी कम्पनीज एंड चिटफंड एक्ट के अंतर्गत कराया गया। फिर एक हजार लोगों के हस्ताक्षर से प्रदेश सरकार को मई 2000 में ज्ञापन दे कर मांग की गई कि खटिक जाति की चक उपजाति को पिछड़ी जातियों की सूची से बाहर निकाला जाए।

उत्तर प्रदेश सरकार ने 14 जिलों में वृहत स्तर पर फील्ड सर्वे कराया जिससे यह स्पष्ट हो गया कि चक, चिक और चिकबा एक दूसरे के पर्यायवाची हैं तथा ये खटिक जाति की उपजाति है।

पिछड़ा वर्ग आयोग में 3 बार इस प्रकरण को रिपोर्ट भेजने हेतु संदर्भित किया जिस पर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग ने भी यह सिफारिश भेज दी कि चक वास्तव में खटिक जाति की उपजाति है इसलिए इसे पिछड़ी जातियों की सूची से बाहर निकाला जाए।

शासन स्तर पर चार मुख्यमंत्रियों सर्वश्री राजनाथ सिंह, मुलायम सिंह यादव, सुश्री मायावती, श्री अखिलेश यादव से मैंने स्वयं तथा पूर्व विधायक माननीय श्री बृज लाल सोनकर तथा खटिक समाज के सैकड़ों साथियों सहित कई बार वार्ता की, संबंधित प्रमुख सचिवों, सचिवों आदि से विचार विमर्श किया और यह तय हो गया कि चक को पिछड़ी जातियों की सूची से निकाल दिया जाए। अब शासनादेश की भाषा को ले कर सहमति नही बन पा रही है।

शासन के संबंधित अधिकारी यह शासनादेश जारी करने को तैयार हैं कि “चक को पिछड़ी जातियों की सूची से बाहर किया जाता है”

जबकि मैं यह आग्रह कर रहा हूँ कि “खटिक जाति की उपजाति होने के कारण चक को पिछड़ी जातियों की सूची से बाहर निकाला जाता है” लिख कर शासनादेश जारी किया जाए ताकि चक समाज के किसी भी प्रार्थी को खटिक जाति के आधार पर अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र जारी करने में कोई भी तहसीलदार, एसडीएम आदि हीलाहवाली ना कर सके।




अब एक बार फिर पूरी शिद्दत से हम सब संघर्ष करें ताकि वर्तमान यूपी सरकार वांछित शासनादेश जारी करने में और देरी ना करे और हमारे समाज के बालक,बालिकाओं का और अहित ना होने पाए।
जय भीम।

द्वारा- श्री एस.एन. चक जी
पुलिस महानिदेशक(से.नि.)
आईपीएस (उ.प्र.)
एवम
राष्ट्रीय अध्यक्ष
देश शक्ति पार्टी

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