खटीक समाज – हिन्दू खटीक जाति का गौरवशाली इतिहास

khatik history

हिन्दू खटीक जाति का गौरवशाली इतिहास, उत्थान एवं पतन

मध्यकाल में जब क्रूर इस्लामी अक्रांताओं ने हिंदू मंदिरों पर हमला किया तो सबसे पहले खटिक जाति के ब्राहमणों ने ही उनका प्रतिकार किया।

राजा व उनकी सेना को तो बाद में सूचना मिलती थी। मंदिर परिसर में रहने वाले खटिक ही सर्वप्रथम उनका सामना करते थे।

तैमूरलंग को दीपालपुर और अजोधन दोनों स्थानों पर सर्वप्रथम खटिक योद्धाओं ने ही रोका था और सिकंदर को भारत में प्रवेश से रोकने वाली सेना में भी सबसे अधिक खटिक जाति के ही योद्धा थे।

तैमूर खटिकों के प्रतिरोध से इतना भयभीत हुआ कि उसने सोते हुए हजारों खटिक सैनिकों की हत्या करवा दी और एक लाख सैनिकों के सिर का ढेर लगवाकर उस पर रमजान की तेरहवीं तारीख पर नमाज अदा की।

मध्यकालीन बर्बर दिल्ली सल्तनत में गुलाम, तुर्क, लोदी वंश और मुगल शासनकाल में जब अत्याचारों की मारी हिंदू जाति मौत या इस्लाम का चुनाव कर रही थी तो खटिक जाति ने अपने धर्म की रक्षा और बहू बेटियों को मुगलों की गंदी नजर से बचाने के लिए अपने घर के आसपास सूअर बांधना शुरू किया।

इस्लाम में सूअर को हराम माना गया है। मुगल तो इसे देखना भी हराम समझते थे। और खटिकों ने मुस्लिम शासकों से बचाव के लिए सूअर पालन शुरू कर दिया। उसे उन्होंने हिंदू के देवता विष्णु के वराह (सूअर) अवतार के रूप में लिया।

मुस्लिमों की गौ हत्या के जवाब में खटिकों ने सूअर का मांस बेचना शुरू कर दिया और धीरे धीरे यह स्थिति आई कि वह अपने ही हिंदू समाज में पददलित होते चले गए। यानि कल के शूरवीर ब्राहण आज अछूत और दलित श्रेणी में हैं।

1857 की लडाई में मेरठ व उसके आसपास अंग्रेजों के पूरे के पूरे परिवारों को मौत के घाट उतारने वालों में खटिक समाज सबसे आगे था। इससे गुस्साए अंग्रेजों ने 1891 में पूरी खटिक जाति को ही वांटेड और अपराधी जाति घोषित कर दिया।

जब आप मेरठ से लेकर कानपुर तक 1857 के विद्रोह की दासतान पढेंगे तो रोंगटे खडे हो जाए्ंगे। जैसे को तैसा पर चलते हुए खटिक जाति ने न केवल अंग्रेज अधिकारियों, बल्कि उनकी पत्नी बच्चों को इस निर्दयता से मारा कि अंग्रेज थर्रा उठे।

क्रांति को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने खटिकों के गांव के गांव को सामूहिक रूप से फांसी दे दिया गया और बाद में उन्हें अपराधि जाति घोषित कर समाज के एक कोने में ढकेल दिया।

आजादी से पूर्व जब मोहम्मद अली जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन की घोषणा की थी तो मुस्लिमों ने कोलकाता शहर में हिंदुओं का नरसंहार शुरू किया, लेकिन एक दो दिन में ही पासा पलट गया और खटिक जाति ने मुस्लिमों का इतना भयंकर नरसंहार किया कि बंगाल के मुस्लिम लीग के मंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि हमसे भूल हो गई। बाद में इसी का बदला मुसलमानों ने बंग्लादेश में स्थित नोआखाली में लिया।

आज हम आप खटिकों को अछूत मानते हैं, क्योंकि हमें उनका सही इतिहास नहीं बताया गया है, उसे दबा दिया गया है। आप यह जान लीजिए कि दलित शब्द का सबसे पहले प्रयोग अंग्रेजों ने 1931 की जनगणना में ‘डिप्रेस्ड क्लास’ के रूप में किया था। उसे ही बाबा साहब अंबेडकर ने अछूत के स्थान पर दलित शब्द में तब्दील कर दिया।

इससे पूर्व पूरे भारतीय इतिहास व साहित्य में ‘दलित’ शब्द का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है।

हमने और आपने मुस्लिमों के डर से अपना धर्म नहीं छोड़ने वाले, हिंसा और सूअर पालन के जरिए इस्लामी आक्रांताओं का कठोर प्रतिकार करने वाले एक शूरवीर ब्राहमण खटिक जाति को आज दलित वर्ग में रखकर अछूत की तरह व्यवहार किया है और आज भी कर रहे हैं।

भारत में 1000 ईस्वी में केवल 1 फीसदी अछूत जाति थी, लेकिन मुगल वंश की समाप्ति होते-होते इनकी संख्या 14 फीसदी हो गई। आखिर कैसे..?

सबसे अधिक इन अनुसूचित जातियों के लोग आज के उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य भारत में है, जहां मुगलों के शासन का सीधा हस्तक्षेप था और जहां सबसे अधिक धर्मांतरण हुआ। आज सबसे अधिक मुस्लिम आबादी भी इन्हीं प्रदेशों में है, जो धर्मांतरित हो गये थे।

डॉ सुब्रहमनियन स्वामी लिखते हैं, ” अनुसूचित जाति उन्हीं बहादुर ब्राह्मण व क्षत्रियों के वंशज है, जिन्होंने जाति से बाहर होना स्वीकार किया, लेकिन मुगलों के जबरन धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया। आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए, उन्हें कोटिश: प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उन लोगों ने हिंदू के भगवा ध्वज को कभी झुकने नहीं दिया, भले ही स्वयं अपमान व दमन झेला।”

प्रोफेसर शेरिंग ने भी अपनी पुस्तक ‘हिंदू कास्ट एंड टाईव्स’ में स्पष्ट रूप से लिखा है कि ” भारत के निम्न जाति के लोग कोई और नहीं, बल्कि ब्राहमण और क्षत्रिय ही हैं।”

स्टेनले राइस ने अपनी पुस्तक “हिन्दू कस्टम्स एण्ड देयर ओरिजिन्स” में यह भी लिखा है कि अछूत मानी जाने वाली जातियों में प्राय: वे बहादुर जातियां भी हैं, जो मुगलों से हारीं तथा उन्हें अपमानित करने के लिए मुसलमानों ने अपने मनमाने काम करवाए थे।

यदि आज हम बचे हुए हैं तो अपने इन्हीं अनुसूचित जाति के भाईयों के कारण जिन्होंने नीच कर्म करना तो स्वीकार किया, लेकिन इस्लाम को नहीं अपनाया।

आज भारत में 23 करोड़ मुसलमान हैं और लगभग 35 करोड़ अनुसूचित जातियों के लोग हैं। जरा सोचिये इन लोगों ने भी मुगल अत्याचारों के आगे हार मान ली होती और मुसलमान बन गये होते तो आज भारत में मुस्लिम जनसंख्या 50 करोड़ के पार होती और आज भारत एक मुस्लिम राष्ट्र बन चुका होता।

यहाँ भी जेहाद का बोलबाला होता और ईराक, सीरिया, सोमालिया, पाकिस्तान और अफगानिस्तान आदि देशों की तरह बम-धमाके, मार-काट और खून-खराबे का माहौल होता। हम हिन्दू या तो मार डाले जाते या फिर धर्मान्तरित कर दिये जाते या फिर हमें काफिर के रूप में अत्यंत ही गलीज जिन्दगी मिलती।

धन्य हैं हमारे ये भाई जिन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी अत्याचार और अपमान सहकर भी हिन्दुत्व का गौरव बचाये रखा और स्वयं अपमानित और गरीब रहकर भी हर प्रकार से भारतवासियों की सेवा की।

Sources:

  • हिंदू खटिक जाति: एक धर्माभिमानी समाज की उत्पत्ति, उत्थान एवं पतन का इतिहास, लेखक- डॉ विजय सोनकर शास्त्री, प्रभात प्रकाशन
  • आजादी से पूर्व कोलकाता में हुए हिंदू मुस्लिम दंगे में खटिक जाति का जिक्र, पुस्तक ‘अप्रतिम नायक: श्यामाप्रसाद मुखर्जी’ में आया है। यह पुस्तक भी प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है।

कौन हैं खटीक?

खटीक भारत का एक मूल समुदाय यानि जाति है जो वर्तमान में अनुसूचित जाति के अंतर्गत वर्गीकृत की गई है। जिनकी संख्या लगभग 1.7 मिलियन है। भारत में यह उत्तर प्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, चंडीगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार और गुजरात में बसे हुए हैं। तथा व्यापक रूप से उत्तर भारत में बसा हुआ है।

प्रत्येक खटीक उपजाति का अपना मूल मिथक है, वे ऐतिहासिक रूप से क्षत्रिय थे जिन्हें राजाओं द्वारा यज्ञ में पशुओं की बलि करने का कार्य सौंपा गया था। आज भी हिंदू मंदिरों में बलि के दौरान जानवरों को वध करने का अधिकार केवल खटीकों को ही है।

खटीक समाज की एक परंपरा के अनुसार खटिक शब्द का उद्गम हिंदी शब्द खट्ट से लिया गया है, जिसका मतलब है कि तत्काल हत्या। वे इसे शुरुआती दिनों से संबंधित करते हैं जब वे राजस्थान के राजाओं को मटन की आपूर्ति करते थे।

पंजाब में खटीक नमक और मदार (कैलोट्रिपोस जाइगैन्टिया) के रस का इस्तेमाल बकरी और भेड़ की खाल रंगने के लिए किया करते थे।

खटीकों के दो प्रमुख उपसमूह हैं सूर खटीक और खलरंगे खटीक। सूर खटीकों (सोनकर) की मान्यतानुसार उनकी उत्पत्ति की परम्परा अलग है।

सूर खटीकों के मुताबिक, मुगल सम्राट औरंगजेब के शासन के दौरान, खटीक समुदाय के सदस्यों को इस्लाम में परिवर्तित किया जा रहा था।

आगे रूपांतरण को रोकने के लिए, समुदाय ने सूअरों को पालने का फैसला किया।

हिंदू खटीक भैरों और सिद्ध मसानी की पूजा करते है वे दुर्गा के रूप में आस्था रखते हैं उत्तर प्रदेश में चामड़ को पूजा जाता है जो दुर्गा का ही एक रूप है।

17 वीं शताब्दी में, जिनक कुलों को इस्लाम में बदल दिया गया था। पंजाब के मुस्लिम खातेक में दो कुलों, राजपूत और घोरी पठान हैं। 1 9 47 में आजादी के बाद से, मुस्लिम खातेक पाकिस्तान में चले गए और उन्होंने तनियों की स्थापना की, और अब उन्हें शेख कहा जाता है।

मूल
Khatik शब्द संस्कृत khatika से व्युत्पन्न है एक कस्तूरा या शिकारी अर्थ है। एक और व्युत्पत्ति शब्द खत से है जिसका अर्थ है कि तत्काल हत्या। अपने समुदाय के मूल के बारे में कई संस्करण हैं गुजरात और राजस्थान में, जहां उन्हें खटकी भी कहा जाता है, वे राजपूत या क्षत्रिय से वंश का दावा करते हैं, जो शासक के दूसरे सबसे उच्च योद्धा वर्ग हैं। उनका मानना है कि वे मूल रूप से योद्धा थे और किसी तरह कुछ आबादी के कारण अपने वर्तमान व्यवसाय को अपनाया। राजस्थान में, खतिक का दावा है कि क्योंकि योद्धा संत परशुराम (विष्णु का 6 वां अवतार) राजपूत से नाराज था, उन्होंने उनके द्वारा अपनी हत्या को छोड़कर अपनी पहचान बदल ली और खटिक के पूर्वजों बन गए
Khatik पड़ोसी उत्तर प्रदेश और राजस्थान से लगभग 200 साल पहले दिल्ली में चले गए। वहां उनका दावा है, वे मूल रूप से कृषक थे और कट्टर 17 वीं शताब्दी के शासनकाल के दौरान मुगल बादशाह औरंगजेब उनमें से कुछ इस्लाम में परिवर्तित हुए थे। हरियाणा में खटिक का दावा है कि उन्होंने राजस्थान के शासकों को मांस की आपूर्ति की और वहां से अन्य स्थानों पर चले गए।

चंडीगढ़ और हरियाणा में खटिक का मानना है कि ब्रह्मा (हिंदू त्रिमूर्ति में प्रजापति) ने उन्हें एक बकरी की त्वचा, वृक्षों और लाखों की छाल दी थी और इसलिए वे पशु, तन और डाई बकरी और छाल और लाख के साथ हिरण छिपाए (गुलाब) , 1 9 1 9)

राजनैतिक दर्जा

16 वीं लोकसभा चुनाव के आधार पर खतिक समुदाय से भारत में संसद के 7 सदस्य हैं, उनके नाम हैं: मनोज राजोरिया, विनोद कुमार सोनकर, डॉ उदित राज, वीरेंद्र कुमार, नीलम सोनकर और भोला सिंह।

बोली जाने वाली भाषा

खतिक उन क्षेत्रों की भाषाओं की बात करते हैं जो वे रहते हैं। गुजरात में, वे गुजराती बोलते हैं, गुजराती लिपि का इस्तेमाल करते हैं, जबकि आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में, मराठी उनकी पहली भाषा है। वे उत्तर प्रदेश में हिंदी बोलते हैं, राजस्थान में स्थानीय राजस्थानी बोलियों; हरियाणा में हरियाणा और बिहार में भोजपुरी। इन सभी भाषाओं देवनागरी लिपि में लिखी गई हैं। Khatik भी हिंदी के साथ परिचित हैं मुस्लिम खटिक उर्दू बोलते हैं और इसे लिखने के लिए फारसी-अरबी स्क्रिप्ट का इस्तेमाल करते हैं।

खटिक खुद चमार (टान्नर), बाल्मीकी (मेहंदी), लोहर (आयरनशिप) और कंजर (जिप्सी) से बेहतर हैं, लेकिन बानिया (व्यापारी), ब्राह्मण (पुजारी), राजपूत (योद्धा) और जाट के ऊपर से नीची हैं। उच्च हिंदू जाति, हालांकि, खतिक को शूद्र वर्ग से संबंधित माना जाता है, चौथी और सबसे नीची जाति।

जीवन स्तर

मुख्य में खटिक का पारंपरिक और वर्तमान कब्जा कत्तल और भेड़ों, बकरियों और सूअरों की बिक्री जारी है। हरियाणा और पंजाब जैसे कुछ राज्यों में, जहां वे मुख्य रूप से मुस्लिम हैं, उनका मुख्य व्यवसाय बकरी और भेड़ छिपकर रंग ला रहा है, जबकि राजस्थान जैसे अन्य राज्यों में वे भी पशु खरीदते हैं और उन्हें एक सहायक उद्यम के रूप में बाजार में बेचते हैं। पंजाब और दिल्ली में हिंदू खटिक उठते हैं और सूअरों को मारते हैं। अन्य राज्यों में वे मध्यम आदमी हैं – सब्जियों, फलों, सूअरों और मुर्गी में पारंपरिक व्यापारी।
भूमिहीन खतिक खेत का एक हिस्सा शेयरधारक आधार पर है। कुछ अपनी साइकिल या बैक-पेक्स, कांच के चूड़ियां, प्लास्टिक के सामान या स्क्रैप-डीलरों से कपड़ा बेचते हैं। कुछ ऐसे हैं जो छोटे होटल चलाते हैं वे रोज़गार मजदूरों के रूप में भी काम करते हैं – सड़क निर्माण और निर्माण स्थलों में। बच्चों को चाय के स्टालों या ऑटोमोबाइल कार्यशालाओं में काम करने के लिए भेजा जाता है उनके बीच कुछ शिक्षकों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, पुलिस निरीक्षक, क्षेत्रीय विकास अधिकारी और प्रशासक हैं। राजनीतिक चेतना स्थानीय और क्षेत्रीय स्तरों पर देखा जाता है।

खतिक में साक्षरता स्तर कम है। अधिकांश परिवार अपने बेटों को तृतीयक स्तर पर अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं लेकिन बेटियां नहीं हैं।

हालांकि वे आधुनिक चिकित्सा स्वीकार करते हैं और परिवार कल्याण कार्यक्रम खटिक के बीच स्वीकार किए जाते हैं, हालांकि वे परंपरागत दवाओं का उपयोग जारी रखते हैं। वे सरकार द्वारा पेश किए गए विभिन्न रोजगार-सृजन और अन्य विकास कार्यक्रमों का लाभ उठाते हैं। वे राष्ट्रीयकृत बैंकों को बचत और सुरक्षित ऋण के लिए उपयोग करते हैं, लेकिन स्थानीय सावकारियों और दुकानदारों पर भी ऋण के लिए निर्भर करते हैं।

बिहार और गुजरात राज्यों में रहने वालों के अलावा, इस समुदाय को अनुसूचित जाति (एससी) के रूप में माना जाता है। यह स्थिति उन्हें (साथ ही अन्य इसी तरह वर्गीकृत जातियों) विशेषाधिकारों और लाभों की एक विशेष अनुदान देती है, जैसे कि सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में विशेष रूप से तय कोटा, प्रतियोगी परीक्षाओं में कम बेंचमार्क, साथ ही संसद और राज्य विधानसभा में आरक्षित सीटें ।

अन्य बातें

Khatik endogamous हैं, या तो वे केवल समुदाय के भीतर से शादी। कभी-कभी वे उपसमूह स्तर पर भी अंतःप्रेर भी होते हैं, लेकिन कबीले के स्तर पर हमेशा एकमात्र होते हैं। वह उत्तर प्रदेश में उप समूह व्यावसायिक, सामाजिक और क्षेत्रीय भेदभाव पर आधारित हैं।

पारिवारिक सदस्यों के बीच बातचीत द्वारा वयस्क विवाह का आयोजन किया जाता है। दहेज नकद और दयालु में भुगतान किया जाता है दुर्लभ मामलों में बहुविवाह की अनुमति है जैसे कि पहली पत्नी की बर्बरता। महिलाओं के लिए विवाह प्रतीकों कांच, प्लास्टिक और लाख चूड़ियाँ, सिंदूर (सिंधुर), माथे (बिंदी), उंगली, कान, नाक और पैर की अंगुली के छल्ले पर डॉट्स हैं।

जूनियर सैरेट और जूनियर लेविरेट की अनुमति है। तलाक, हालांकि संभव है, सामाजिक रूप से निराश है और बहुत दुर्लभ है। आंध्र प्रदेश के अलावा विधवा, विधुर और तलाकशुदा पुनर्विवाह की अनुमति है, जहां तलाक और विधवा पुनर्विवाह पूरी तरह से निषिद्ध है।

संयुक्त परिवार खतिक में आम है लेकिन वे अलग-अलग रह रहे हैं। विरासत पैतृक है; बेटे माता-पिता की संपत्ति को समान रूप से वारिस करते हैं और सबसे पुराना पिता के अधिकार के प्रति सफल होता है। बेटियों को कोई विरासत नहीं मिला यद्यपि खतिक महिलाओं की स्थिति कम है, उनके पास धार्मिक, धार्मिक, धार्मिक और राजनीतिक गतिविधियों में भी भूमिका है। वे कृषि श्रमिकों, घरेलू नौकरों के रूप में काम करके, कपड़े बनाने, स्वेटर बुनाई, पेपर बैग और लिफ़ाफ़े बनाने, फलों और सब्जियों को बेचने के द्वारा परिवार की आय में योगदान करते हैं। वे कभी-कभी जानवरों के पालन करने और कत्तल पशुओं की सफाई में अपने लोगों की मदद करते हैं।

खतिक में क्षेत्रीय लोक संगीत, लोककथाओं और लोगों का अस्तित्व होता है। फ़ोल्क्सोंग्स ज्यादातर महिलाओं द्वारा गाए जाते हैं और त्यौहारों और जन्म और विवाह जैसे अन्य शुभ अवसरों के दौरान केवल महिला नृत्य करते हैं। दीवार चित्रों, देवी दुर्गा और कढ़ाई की छवियां बनाने में उनकी कुछ कलाएं और शिल्प हैं

खटिक के पास प्रत्येक राज्य में अपनी जाति परिषद है, दोनों गांवों और क्षेत्रीय स्तर पर बुजुर्ग लोगों द्वारा प्रतिनिधित्व किया गया है। गुजरात में क्षेत्रीय परिषद को बारारा पंच के रूप में जाना जाता है। राजस्थान में गांव के स्तर पर एक जाति पंचायत (जाति परिषद) है जो शादी, तलाक, सामुदायिक मानदंडों का उल्लंघन और नकदी जुर्माना से संबंधित सामाजिक प्रकृति के विवाद को सुलझाने में जुटी है। परिषद को भी बहिष्कृत करने की शक्ति है

विश्वास व् मान्यताएं

अधिकांश खतिक हिंदू हैं और सभी प्रमुख हिंदू देवताओं और देवी की पूजा करते हैं। कई खतिक के पास अपने क्षेत्र के विभिन्न क्षेत्रीय देवताओं के लिए बहुत सम्मान है और बुरी आत्माओं में विश्वास करते हैं। पूर्वजों की पूजा उनके विश्वास प्रणाली का एक अतिरिक्त हिस्सा है

खतिक सभी प्रमुख हिंदू त्योहारों जैसे जन्माष्टमी (कृष्णा के जन्मदिन), नवरात्री (9 रातों का त्योहार), दिवाली (दीपक का त्योहार) और होली का जश्न मनाते हैं। हिंदू खटिक के मृतकों का अंतिम संस्कार और एक नदी में राख को विसर्जित करना, अधिमानतः हरिद्वार में पवित्र गंगा आंध्र प्रदेश और मुस्लिम खटिक ने मरे हुओं को दफन दिया

सिख खतिक गुरु नानक के जन्मदिन, लोहड़ी (फसल त्योहार), और गुरुद्वारों की यात्रा जैसे त्योहार मनाते हैं, जबकि मुस्लिम खतिक मस्जिदों की यात्रा करते हैं और ईद और मुहर्रम जैसे मुस्लिम त्योहार मनाते हैं।

उनकी क्या जरूरत है?
खतिक को शिक्षा तक पहुंच की जरूरत है, खासकर लड़कियों के लिए

खटीक जाति भारत और पाकिस्तान में पाई जाती है तथा दक्षिण एशिया में पाई जाने वाली यह सबसे वृहद जातियों में से एक है।

खटीक शब्द “आखेटक” का ही अपभ्रंश है जिसका अर्थ होता है शिकारी या शिकार करने वाला।

पशुओं की बलि करते समय खट्ट से एक ही वार में सिर को धड़ से अलग कर देने के कारण ही खटीक नाम पड़ा ऐसा माना जाता है।

इतिहास से मिले साक्ष्यों के अनुसार खटीक जाति का मुख्य व्यवसाय पशुओं की बलि देना होता था, खटीक जाति एक वीर जाति होती है जो जंगली जानवरों का शिकार करके तथा पालतू भेड़ बकरियों के मांस द्वारा राजाओं की सेना के लिए मीट की आपूर्ति व भोजन का प्रबंध किया करते थे।



आज भी देशभर में खटीक जाति के लोग मीट का व्यवसाय करके अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। इनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति को देखते हुए भारत देश के कुछ राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश व दिल्ली में हिन्दू खटीक समाज को अनुसूचित जाति का दर्जा मिला हुआ है।

खटीक भेड़ – बकरियों व घोड़ों को पालते थे, जिनके समूह को “सूर्यवँशी खटीक” के नाम सम्बोधित किया जाता है। ये घोड़ागाड़ी (ताँगा) चलाकर अपनी गुजर बसर किया करते थे।

इसके अलावा ऐसा माना जाता है कि मुस्लिम आक्रांताओं से अपने परिवार की बहू बेटियों की इज्जत बचाने के लिए बहुत से खटीकों ने सूकर पालन शुरू कर दिया ताकि मुस्लिम आक्रांताओं को अपने घर से दूर रखा जा सके। इन खटीकों को बाद में “ख़ल्लु खटीक” नाम से जाना जाने लगा।




वर्तमान समय में इनको सोनकर नाम से जाना जाता है। सूर्यवँशी और सोनकर आपस में शादी ब्याह करने से परहेज करते हैं उम्मीद है कि शिक्षा के जरिये दोनों वर्ग अपनी रूढ़िवादी सोच को बदलेंगे व फिर से आपस में शादी ब्याह करने लगेंगे।

पूर्व में खटीक जाति के साथ छुआछात की जाती रही है जिसके कारण खटीक समाज अपेक्षाकृत प्रगति नहीं कर सका और आर्थिक रूप से कमजोर रहा।

लेकिन जैसे जैसे समाज शिक्षा प्राप्त कर रहा है वैसे वैसे समाज की आर्थिक स्थिति सुधरती जा रही है, आज के समय में खटीक जाति के लोग हर क्षेत्र में बेहतर कार्य कर रहे हैं व ऊंचे पदों पर कार्यरत हैं।

16वीं लोकसभा चुनावों (2014) के आधार पर भारत में खटीक समाज के 7 सांसद हैं। जिनके नाम मनोज राजौरिया, विनोद सोनकरडॉक्टर उदित राजवीरेंद्र कुमार खटीक, नीलम सोनकर, डॉक्टर भोला सिंह हैं।

कुछ विद्वानों द्वारा सूर्यवँशी खटीक समाज के 360 प्रमुख गोत्र निर्धारित किये गए हैं इनमें चन्देल, पंवार, चौहान, बड़गुजर, राजौरा, बुंदेला आदि ऐसे गोत्र हैं जो राजपूतों में भी पाए जाते हैं।

इसलिए कुछ लोगों का मानना है कि खटीक समाज भी राजपूत होते हैं लेकिन अभी तक इसके कोई पुख्ता सबूत नहीं मिल पाने के कारण यह एक बहस का मुद्दा बना हुआ है।

खटीक समाज के कुछ दलित चिंतकों का मानना है अगर खटीक भी राजपूत होते तो राजपूतों द्वारा खटीकों के साथ रोटी बेटी का व्यवहार अवश्य किया जाता। और राजपूतों के समारोहों, आयोजनों में खटीकों को भी आमंत्रित किया जाता।

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