खटीक ही क्यों मनाते हैं महाकाली उत्सव?

महाकाली खटीक समाज की इष्टदेवी या कुलदेवी हैं इसलिए हम महाकाली की पूजा करते हैं और महाकाली उत्सव मनाते हैं।

खटीक महासंघ | “महाकाली उत्सव” खटीक समाज का प्रमुख त्योहार है इस दिन खटीक समाज द्वारा बकरों की बलि और महाकाली की पूजा और विसर्जन किया जाता है।

झांसी और कलकत्ते में खटिकयाने का ‘महाकाली उत्सव’ काफी प्रसिद्ध है। हर साल दशहरे के दिन यहां लाखों लोग महाकाली उत्सव के दर्शन करने के लिए देश के कोने कोने से सम्मिलित होते हैं।

शिवपुरी, झांसी में खटिकयाने वाली “महाकाली का विसर्जन उत्सव”

आपको जानकर हैरानी होगी कि कलकत्ते और झांसी के खटिकयाने में “महाकाली उत्सव” के दौरान खटीक समाज द्वारा 1 ही दिन में लगभग 1100 बकरों की बलि दी जाती है। माना जाता है कि यहां जो मांगों वही मिलता है फिर मनोकामना पूरी होने पर बकरे की बलि चढ़ाई जाती है।

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काली माता के विसर्जन के साथ खटीक समाज विजयदशमी को शस्त्र पूजन का आयोजन करते हैं परंतु इतिहास के जानकार व्यक्तियों द्वारा गुमराह कर हमें अपने पथ से विमुख कर दिया आप सभी से विशेष आग्रह है कि क्षत्रियों की निशानी शस्त्र होते हैं और विजयदशमी के दिन शस्त्रों की पूजा अवश्य करनी चाहिए।

श्री श्री 1008 महाकाली उत्सव समिति, सईसपुरा, शिवपुरी द्वारा हर वर्ष झांसी में “महाकाली उत्सव” का आयोजन किया जाता है।

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खटीक ही क्यों करते हैं काली की पूजा?

खटीक समाज के लोग प्राचीनकाल में शिकार करके अपना पेट भरते थे शिकार करने को आखेट भी कहते हैं और शिकारी को आखेटक। इसलिए धीरे धीरे हमारा नाम आखेटक से खटीक हो गया।
हम जंगली जानवरों का शिकार करके अपना पेट भरते और हिरनों का शिकार करके उनकी छालों को रंगकर बेचा करते थे।


राजा महाराजा हमारी बहादुरी और शिकार कौशल से वाकिफ थे इसलिए वे आखेटकों को अपने साथ शिकार पर ले जाया करते थे, इससे वे निडर होकर शिकार करते थे। जब कोई विदेशी हमारे राजा के राज्य पर आक्रमण करता था तो आखेटक ही अपने राजा की मदद करते थे चूंकि वे शस्त्र कौशल में निपुण होते थे इसलिए जीतते भी थे।


वनों के नष्ट होने से हमने जंगली जानवरों का शिकार करना तो छोड़ दिया लेकिन उस समय हमें कोई काम नहीं आता था इसलिए हम भेड़ बकरियों को पालने का काम करने लगे। राजा की सेना के लिए मांस की आपूर्ति आखेटक ही करते थे। चूंकि जीव हत्या पाप होता है इसलिए हम पहले काली माता के चरणों में बलि देकर उन्हें प्रसन्न करते थे।

यज्ञ आदि में खटीक ही बलि देने का कार्य करते थे, काली के मंदिर में खटीक ही पुजारी होता है। राजा महाराजाओं के साथ रहते रहते हम उनके गुणों को अपनाते रहे और धीरे धीरे खुद को क्षत्रिय ही मानने लगे


जब कभी हमारी भेड़ बकरियों में महामारी फैलती थी तो हम अपनी इष्टदेेेेवी काली माता के आगे बकरे की भेंट चढ़ाते थे तो महामारी रुक जाती थी और हमारा नुकसान होने से बच जाता था।

भेड़ बकरियां चराते-चराते हम दूर तक निकल जाते थे इस तरह हम पूरे भारत में फैल गए। हमारे पास हजारों भेड़ बकरियां हो जाती थीं जिनके खाल, बाल व मांस बेचकर हम धनवान होते गए जिसके कारण हममें अकड़ आती गई।

क्षत्रिय किसे कहते हैं?

आप यह समझ लीजिए कि क्षत्रिय कोई जाति नहीं है। प्राचीन काल में जो भी बहादुर था, हथियार चलाना जानता था और आक्रमणकारियों से अपने सम्प्रदाय, बहू बेटियों की रक्षा करने में समर्थ था उसी को क्षत्रिय कहते थे। भारत की सभी मूलनिवासी जातियां बहादुर थीं क्षत्रिय थीं और हथियार चलाने में निपुण थीं।

फिर भारत में आर्य आये उन्होंने देखा कि मूलनिवासी तो बहुत ही बहादुर और लड़ाका होते हैं। वे हमें लड़कर नहीं हरा सकते थे इसलिए उन्होंने हमें ऊंच नींच के फेरे में डालकर आपस में ही एक दूसरे का बैरी बना दिया और सदियों तक हमें शिक्षा व संसाधनों से दूर रखा जिस कारण हम पिछड़ते चले गए।

विदेशियों ने हमारे मांस के काम को घृणित बताकर हमें अछूत बना दिया और इस तरह हम पददलित होते चले गए। जबकि हमें यह बात स्वीकारनी होगी कि सभी मूलनिवासी भाई-भाई हैं फिर ऊंचे नींचे कैसे हो गए?

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