महाराजा खट्वांग का इतिहास

Khatwang

काफी दिनों से बहुत से पाठक महाराजा खट्वांग जी का इतिहास जानने के लिए आग्रह कर रहे थे तो मैं इंटरनेट से खोजकर जानकारी आप तक पहुँचाने का प्रयत्न कर रहा हूँ ।

विकिपीडिया के अनुसार खट्वांग शिव के हाथ का एक आयुध होता है जिसमें दंड के ऊपर पशु के खुर के बीच मानव कपाल लगा होता था। योगी और संन्यासी भी इस आयुध का उपयोग करते हैं। लोकजीवन में इसे जादू की लकड़ी कहा जाता है।

“खट” शब्द के “खट्वांग” से मिलते जुलते होने के कारण ही खटीक समाज को खट्वांग से जोड़कर देखा जाता है राजस्थान के कई राज्यों में खटीक समाज द्वारा 22 जनवरी के दिन खट्वांग महाराज की जयंती मनाई जाती है। हालाँकि खटीकों का खट्वांग से संबंध होने का कोई प्रमाण नहीं मिला है ।

रामनारायण पंचांग कैलेंडर में खट्वांग जयंती

रामनारायण पंचांग कैलेंडर में खट्वांग जयंती को खटीक समाज से जोड़कर लिखा गया है अगर हम रामनारायण के २०१५ का कैलेंडर देखें तो हम पाएंगे कि उसमें खट्वांग जयंती का नामोनिशान नहीं है यानि कैलेंडर वालों ने लोगों को जयंती मानते हुए देखा और कैलेंडर में चिपका डाला। हालाँकि यह कैलेंडर कोई पुख्ता सबूत नहीं है ना कोई वेद उपनिषद है जिसको ऐतिहासिक माना जाये। यह सिर्फ सुनी सुनाई बातों पर आधारित है इसलिए इस कैलेंडर में खट्वांग जयंती देखकर खुश होने की जरूरत नहीं है।

इस कैलेंडर में खट्वांग जयंति को खटीक समाज से जोड़कर दिखाया गया है।




अयोध्या के सुविख्यात रघु राजा का पितामह । महाभारत में, खट्वांग नाम से इसका निर्देश प्राप्त है । रामायण में, भगीरथ का पिता दिलीप (प्रथम), एवं यह, ये दोनों एक ही माने गये है । किंतु वे दोनों अलग थे । भागवत एवं विष्णुमत में सूर्यवंशी राजा विश्वसह का पुत्र। इसने देवदानव युद्ध के समय स्वर्ग जाकर देवताओं की बड़ी सहायता की थी। वायु पुराण में इस राजा की बड़ी महिमा गाई गई है।, ब्रह्मांड एवं वायुमत में विश्वमहत् का, तथा मत्स्यमत में यह रघु का पुत्र था ।

कई ग्रंथों में, इसे दुलिदुह का पुत्र भी कहा गया है । मत्स्य, पद्म, एवं अग्नि पुराणों में दी गयीं इसकी वंशावलि में एकवाक्यता नहीं है । पितृ की कन्या यशोदा इसकी माता थी । इसकी पत्नी का नाम सुदक्षिणा था । इसका पुरोहित शांडिल्य था ।

इक्ष्वाकु वंश। (साभार: krishnakosh.org)

इसमें सौभरि ऋषि, राजा त्रिशंकु, हरिश्चन्द्र, सम्राट सगर और खट्वांग ऋषि आदि का वर्णन है। खट्वांग राजर्षि थे। इनका वर्णन हम पहले भी देख चुके हैं। इन्होंने देवताओं की सहायता की थी। सहायता करने के बाद जब देवताओं ने कुछ माँगने के लिए कहा तो इन्होंने पूछा कि मेरे मरण में कितना समय बाकी है। देवताओं ने उत्तर दिया-आप के मरण में केवल दो घंटे रहे गये हैं। तब खट्वांग राजा ने दो घंटे में ही सब कुछ त्याग कर अपने मन को भगवान में लगा दिया। राजा अंशुमान्, उनके पुत्र दिलीप और दिलीप के पुत्र भगीरथ अपने महत् प्रयास से गंगाजी को धराधाम पर ले आये। सूर्य वंश-इक्ष्वाकु वंश में ऐसे-ऐसे महान् राजा हुए हैं। उसके बाद इसी इक्ष्वाकु वंश में राजा दिलीप हुए, राजा दिलीप के पुत्र हुए रघु, रघु के पुत्र हुए अज, अज के पुत्र हुए दशरथ और दशरथ के पुत्र हुए भगवान श्रीरामचन्द्र जी। बोलिये भगवान श्री रामचन्द्र जी की जय।

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किसी समय अयोध्या में सूर्यवंशी राजा खट्वांग राज्य करते थे।

साभार- http://bharatdiscovery.orghttp://www.transliteral.org

दिलीप खट्वांग के प्रशंसा पर एक पुरातन श्लोक भी उपलब्ध है काफी दिनों तक दिलीप राजा को पुत्र नहीं हुआ । पुत्रप्राप्ति के हेतु से, यह वसिष्ठ के आश्रम में गया । राजा के द्वारा विनंति की जाने पर, वसिष्ठ ने इसे पुत्र न होने का कारण बताया । वसिष्ठ बोले, “एक वार तुम इन्द्र के पास गये थे । उसी समय तुम्हारी पत्नी ऋतुस्नात होने का वृत्त तुम्हें ज्ञात हुआ । तुम तुरंत घर लौटे । मार्ग में कल्पवृक्ष के नीचे कामधेनु खडी थी । उसे नमस्कार किये बिना ही तुम निकल आये । उस लापरवाही के कारण उसने तुम्हें शाप दिया, ‘मेरे संतति की सेवा किये बिना तुम्हें संतति नहीं होगी’। उस शाप से छुटकारा पाने के लिये मेरे आश्रम में स्थित कामधेनुकन्या नंदिनी की तुम सेवा करो । तुम्हें पुत्र होगा।’ इसी समय वहॉं नंदिनी आई । उसे दिखा कर वसिष्ठ ने कहा, ‘तुम्हारी कार्यसिद्धि शीघ्र ही होगी’। इसने धेनु को चराने के लिये, अरण्य में ले जाने का क्रम शुरु किया ।




एक दिन मायावी सिंह निर्माण कर, नंदिनी ने इसकी परीक्षा ली। उस समय सदेहार्पण कर, धेनुरक्षण करने की सिद्धता इसने दिखायी । तब धेनु प्रसन्न हो कर, इसे रघु नामक विख्यात पुत्र हुआ यह कथा कालिदास के रघुवंश में पूर्णतः दी गयी है । यह पृथ्वी पर का कुबेर था । इसने सैकडों यज्ञ किये थे । प्रत्येक यज्ञ में लाखों ब्राह्मण रहते थे । इसने सब पृथ्वी ब्राह्मणों को दान दी थी । इसीके यज्ञों के कारण, यज्ञप्रक्रिया निश्चित हुई । इसके यज्ञ में सोने का यूप था । इसका रथ पानी में डूबता नहीं था । दिलीप के घर पर ‘वेदघोष,’ ‘धनुष की रस्सी की टँकार’, खाओ’, ‘पियो’, एवं ‘उपभोग लो’, इन पांच शब्दो का उपयोग निरंतर होता था सम्राट तथा चक्रवर्ति के नाते इसका निर्देश किया जाता था । महाराजा खटवांग सूर्यवंशी महाप्रतापी, धर्म परायण, सत्य का परीपालन करता राजा है। इसका नाम दिलीप भी था।

खट्वांग ने देवासुर संग्राम में देवताओं की बड़ी सहायता की थी। दानवों का संहार किया और उन्हें युद्ध से भगा दिया। तब देवताओं ने
उससे वर मांगने को कहा। कुतूहलवंश # खट्वांग (दिलीप) ने पूछा कि उसकी कितनी आयु शेष है। देवज्ञ देवता बोले ‘मात्र एक घंटा’ खट्वांग वायु वेग से पृथ्वी पर आया और विष्णु स्तुति की और बैकुण्ठ में गया। महाभारत में उसका उल्लेख आता है। विष्णु पुराण का कथन है कि दिलीप जैसा पृथ्वी पर कोई नहीं हुआ, जिसने मात्र कुछ क्षण पृथ्वी लोक पर रहकर मनुष्यों में अपनी दानवृत्ति, सत्य, ज्ञान का आचरण करके अमरता प्राप्त की हो। तीनों लोकों में उसने अपना यश स्थापित किया।

श्रीमद् भागवत में लिखा है कि यदि मृत्यु ज्ञात हो जाए तो उससे बचना का नहीं सुधारने का प्रयास करना चाहिए। इसे कोई भी बदल नहीं सका है। श्रीमद्भागवत में एक छोटी सी कथा का वर्णन है जो प्रकार है-

किसी समय अयोध्या में सूर्यवंशी राजा खट्वांग राज्य करते थे। उनकी कीर्ति स्वर्ग तक थी। मृत्यु के कुछ ही क्षण पहले इंद्र के द्वारा खट्वांग राजा को यह पता लगा मेरी मृत्यु में कुछ ही समय शेष हैं तो राजा ने दान दक्षिणा दी। वैराग्य लिया। सरयू तट पर तप किया और योग क्रिया द्वारा अपने शरीर को मुक्त कर दिया तथा मोक्ष को प्राप्त किया। इस पूरी कथा से आशय है कि राजा खटवांग बड़े पराक्रमी थे लेकिन उन्होंने भी मृत्यु से बचने की अपेक्षा उसे सुधारने का ही प्रयास किया। अत: हमें भी मृत्यु से भय न रखते हुए उसे सुधारने का प्रयास करना चाहिए

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