आजादी के बाद से रोजगारों का हाल – देश में बढ़ती बेरोजगारी

सरकारी नौकरी में तन्ख्वाह कम और भ्रष्टाचार की मलाई खत्म हो जाये तो बहोत से लोग देशसेवा छोड़कर प्राईवेट नौकरी की सेवा में चले जायेंगे ,
इनमें वो सरकारी नौकर भी हैं जिन्हें जनता चुनती हैं ,

unemployement

छठवां वेतन आयोग लगने से पहले सत्तर-अस्सी एवं नब्बे के दशक में लोग इसी वजह से सरकारी नौकरियां छोड़कर भाग जाया करते थे,

आजादी के समय जब देश की सरकारें आज की तरह अमीर नहीं हुआ करती थी, देश में औद्योगिक क्रांति नहीं हुई थी तब खेती-किसानी, जमींदारी , धन सम्पदा से सम्पन्न लोग नौकरी, नौकर और जी हुजूरी करने के ख्याल से भी बिदक जाते थे,
उस समय सरकार के पास मंत्रालयों , सरकारी विभागों यहां तक की पुलिस विभाग को भी पर्याप्त संख्या में गाड़ियां देने के भी पैसे नहीं थे, तो उपयुक्त तन्ख्वाह कहा से दे पाते,

लाल बहादुर शास्त्री जी के प्रधानमंत्री काल में चीन से जंग के दौरान भारतीय सेना के साजो सामान के लिए फंड की बड़ी कमी थी, उस वक्त देश की सुरक्षा के नाम पर हर आदमी ने अपनी सामर्थ्य के हिसाब से सरकार को चंदे दिये थे ,

आजादी के समय लोग शिक्षा को ज्यादा महत्व नहीं देते थे , खेती किसानी में लगे और सम्पन्न लोगों का ऐसा मानना था कि हम जो कार्य कर रहे हैं यही जीवन के लिए पर्याप्त हैं हमें भला शिक्षा और नौकरियों की क्या जरूरत , तब नौकरियों को हेय दृष्टि से देखा जाता था, उस जमाने में मजबूरन कक्षा पांच पास भी आज के स्नातक स्तर के क्लर्क लेवल पर रख लिए जाते थे,

फिर देश में औद्योगिक क्रांति आई , मिल कारखानों की तादाद बढ़ने लगी , देश की सरकारें धीरे धीरे अमीर होने लगी, देश की तरक्की का सफर शुरु हो गया लेकिन उसके सापेक्ष कृषि क्षेत्र में ह्रास होना शुरू हो गया,
गांवों में बेगार करने वाले मजदूर शहरों की तरफ भागने लगे,
कृषि आय घटने लगी,
नतीजन नौकरियों की मांग में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होने लगी,
अब जो नौकरियों के नाम चिढ़ जाते थे वही नौकरी पाने की कतार में सबसे आगे खड़े मिलते थे ,

बहरहाल अब नौकरियां भी खत्म हो रही हैं , आटोमेशन का जमाना हैं अब कारखानों में भी मजदूरों के ज्यादातर काम मशीनों से लिए जाने लगे हैं ,
पोखरे तालाब नहरे भी मजदूरों के बजाय मशीनों से खोद ली जा रही हैं ,
इंसानी कामों का मशीनीकरण हो गया हैं , ये उन देशों के लिए तो कारगर था जिनकी आबादी कम थी , काम करने वाले लोग कम थे तो उन्होंने इन तकनीकों को विकसित किया और उपयोग में लेकर आये लेकिन भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में ये तकनीके लोगों के रोजगार पर किसी आपदा से कम भी नहीं हैं ,
बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ रही हैं सरकार लोगों को छोटे मोटे काम धंधा करके जीने के लिए प्रेरित कर रही हैं ,
कहते हैं समय का पहिया घूमता हैं और एक चक्र पूरा करने के बाद वापस वही पहुंच जाता है जहां से उसने घूमना शुरू किया था ,

समय वापस वही आ रहा हैं , जब लोगों को लगेगा जिस छोटे मोटे काम धंधे से जिंदगी चलती हैं शुरूआत से उसी में ध्यान लगाना ही बेहतर हैं , जैसे किसी पंसारी की दुकान अच्छी चलती हैं तो उसके बच्चे भी शिक्षा के महत्व को नकार कर पढ़ाई लिखाई छोड़कर दुकान में ही लग जाते हैं , उनके आगे पढ़ने की लालसा खत्म हो जाती हैं ,
वही हाल इन काम धंधे में लगे लोगों का भी होना हैं,
बेरोजगारी के बढ़ने के साथ साथ देश में शिक्षा का महत्व भी घट ही जायेगा,
और फिर हम वापस वही पहुँच जायेंगे जहां से हम चले थे जहां हम आजादी के वक्त खड़े थे।

(नोट:- इस लेख में दिए सभी विचार कुमार गौरव सोनकर जी के हैं)

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